BREAKING NEWS

6/recent/ticker-posts

लोकतंत्र की बुनियादी परीक्षा और गाँवों की बदलती करवट


​उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है', यह कहावत पुरानी है। लेकिन उत्तर प्रदेश की सत्ता का असली स्वाद और संघर्ष की जड़ें प्रदेश की 57,695 ग्राम पंचायतों की पगडंडियों में छिपी होती हैं। वर्ष 2026 के प्रस्तावित पंचायत चुनावों ने एक बार फिर ग्रामीण अंचलों में सरगर्मी तेज कर दी है। यद्यपि पिछड़ा वर्ग आयोग के पुनर्गठन और आरक्षण की पेचीदगियों के चलते चुनावों की सटीक तारीखों पर संशय के बादल हैं, लेकिन ग्रामसभाओं में भावी प्रत्याशियों की 'बिसात' बिछनी शुरू हो गई है।

​प्रत्याशियों की दशा: उम्मीद और उधेड़बुन के बीच

​वर्तमान में ग्राम प्रधान पद के दावेदारों की स्थिति किसी 'अग्निपरीक्षा' से कम नहीं है। एक ओर जहाँ पुराने दिग्गज अपनी विरासत बचाने को छटपटा रहे हैं, वहीं युवा डिजिटल साधनों के साथ मैदान में है। प्रत्याशियों के सामने इस समय तीन बड़ी चुनौतियां और स्थितियाँ स्पष्ट दिखाई दे रही हैं:

  • आरक्षण का चक्रव्यूह: अधिकांश प्रत्याशी इस समय 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में हैं। सरकार द्वारा नए सिरे से आरक्षण तय करने की खबरों ने कई दिग्गजों की नींद उड़ा दी है। जिसे अपनी सीट सुरक्षित लग रही थी, वह अब नए सर्वे और आयोग की रिपोर्ट के इंतजार में दुविधा में है।
  • सोशल मीडिया और 'हाई-टेक' प्रचार: अब गाँव की प्रधानी केवल 'हुक्के की गुड़गुड़ाहट' और 'चौपालों' तक सीमित नहीं रही। प्रत्याशी अब व्हाट्सएप ग्रुप और फेसबुक लाइव के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। गाँव की गलियों में विकास से ज्यादा चर्चा अब उम्मीदवारों के डिजिटल प्रोफाइल की हो रही है।
  • सक्रियता का दबाव: चुनाव भले ही अप्रैल-मई से खिसककर थोड़ा आगे बढ़ जाएं, लेकिन दावेदारों के लिए जनता के बीच जाना मजबूरी है। शादी-ब्याह से लेकर तेरहवीं तक, प्रत्याशियों की उपस्थिति अनिवार्य हो गई है। खर्च की सीमा और समय की अनिश्चितता ने छोटे उम्मीदवारों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

​विकास का मुद्दा बनाम जातीय समीकरण

​विडंबना यह है कि हर बार की तरह इस बार भी ग्रामसभाओं में 'विकास' के बड़े दावों के नीचे जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों का शोर भारी पड़ता दिख रहा है। हालांकि, मनरेगा, आवास योजना और स्वच्छता अभियान जैसी योजनाओं के क्रियान्वयन में धांधली या पारदर्शिता अब चुनाव का मुख्य मुद्दा बन रही है। जागरूक होते ग्रामीण अब प्रत्याशियों से "कागजी प्रधान" होने के बजाय "जमीनी सेवक" होने का हिसाब मांग रहे हैं।

​पंचायत चुनाव महज प्रतिनिधि चुनने का जरिया नहीं, बल्कि ग्रामीण सशक्तिकरण का पर्व है। प्रत्याशियों की वर्तमान आपाधापी यह दर्शाती है कि प्रधानी का पद आज भी ग्रामीण समाज में प्रतिष्ठा का सर्वोच्च पैमाना है। शासन को चाहिए कि वह आरक्षण की स्थिति जल्द स्पष्ट करे ताकि लोकतंत्र की इस बुनियादी इकाई में अनिश्चितता का माहौल खत्म हो और 'ग्राम स्वराज' की संकल्पना को बल मिल सके।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ